सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

नील सोनी और अलका आर्य नदी के दो छोर हैं। नील एक रंगकर्मी है और अलका आर्य आरक्षित कोटे से ऊँचे औंधे वाली अफ़सरानी है। नदी के दो छोर हैं दोनों लहरें जिन्हें जोड़ती ज़रूर हैं एक नहीं कर पातीं।

नील सोनी और अलका आर्य नदी के दो छोर हैं। नील एक रंगकर्मी है और अलका आर्य आरक्षित कोटे से ऊँचे औंधे वाली अफ़सरानी है। नदी के दो छोर हैं दोनों लहरें जिन्हें जोड़ती ज़रूर हैं एक नहीं कर पातीं।  

ज्वार -भाटा से रागात्मक संबंध कब एक सुनामी में बदल जाएं ,'ताऊ  -ते' या 'कैटरीना' हो जाएं इसका कोई निश्चय नहीं। नील परम्परा-बद्ध लेखन की तरह हैं तो अलका छंद मुक्त कविता से लेकर नै कविता,हाइकु से लेकर क्षणिका तक एक साथ सब कुछ है। कब बैलाड , आलाऊदल की तरह वीर-गाथा बन जाए हल्दी घाटी हो जाए इसकी भी  कोई प्रागुक्ति नहीं कर सकता। 

 उपन्यास के अंदर एक अंडरकरेंट है अंतर् धारा है सतह के बहुत नीचे जहां एक साथ थियेटर की प्रतिबद्धता और अनुशासन  है ,साधन और साध्य का ऐक्य भी है तो अफसरी की बदमिज़ाजी और अहंकार भी है। और इसके के नीचे दबी कुचली एकल नारी की व्यथाकथा है निस्संगता और बेबसी है। अलका के यहां स्थायित्व नहीं है। शी इज़ इमोशनालि अनस्टेबिल।

एक तुनकमिज़ाज़ी का मूर्त रूप है अलका आर्य जो सामूहिक रूप से धू... आँ पैदा करती है और उस धुंध के आड़ में अपनी पसंद ढूंढ लेती है। आउट आफ दी वे जाकर नील की  मदद करती है। उसकी पेंशन रिलीज़ कराती है। अर्थ प्रबंधन में भी मददगार साबित होती है। 

अफसरी उसके हाथ में ऐसा हथगोला है जिसे  समाज के चील कौवो और गिद्धों पे दागने में वह ज़रा भी नहीं हिचकती। एक सामाजिक गुलेल से वह विपक्षी को  कब निशाने पे ले ले नील इससे बेहद आतंकित रहता है। 

अलका और नील लिविंगइन रिलेशनशिप ,सहजीवन में हैं इसे कस्बाई प्रवृत्ति के लोगों को समझाने में उन्हें बहुत मशक्कत करनी पड़ती है। सामाजिक झरबेरियों की चुभन यहां बेहद की है। पेशे से नील एक टीचर है जो सेवा निवृत्ति के बाद अपनी पेंशन रिलीज़ कराने के लिए बेतहाशा ख़ाक छान रहा है ,हताश होने से पहले अलका उसे एक झटके में बाहर निकाल लेती है लालफीता शाही के चक्रव्यू से। नील उपकृत है दबा जाता है अलका के एहसानात  में।

अलका एक उत्पीड़ित आहत बाघिन है जो बेहद आहत हुई है अपनों  के हाथों।पैदाइशी लेबल से उबरने में उसका जीवट उसका मददगार बनता है। अलका के यहां जातिगत दलदल  कभी भी बघनखे खोल के नर-सिंह  अवतार ले सकती है। बड़े बड़ों को वह उनकी औकात कद काठी बतलाने में ज़रा देर नहीं लगाती है।

गाली -गलोच से लेकर एक खौफ पैदा करना अपने आसपास के परिवेश में उसकी आदत बन गई है। घबराते हैं उससे उसके मातहत है। लेकिन वह अंदर से टूटी हुई एक आधी अधूरी महिला है, जो सम्पूर्णता की तलाश में है।चीज़ें उसे आकर्षित ज़रूर करती हैं लेकिन वह उन्हें निर्जीव बनाकर रखना चाहती है साधना चाहती है सईस  के  घोड़े की तरह जब दिल चाहे चाबुक फटकार दो ,ऐड़ लगा दो। यही उसकी डिफेन्स मैकेनिज़्म है जीने का अंदाज़ है। चन्दा ,श्यामा ,नील के नाटकों की समक्ष हैं अदाकारा हैं जो अलका को बतलाती हैं नील एक पूर्ण -पुरुष है। वह उलट पुलट कर सब कुछ देख लेना चाहती है सच्चे सौदे की तलाश में है।कोई बिचौलिया नहीं चाहिए उसे।  

आखिरी पृष्ठों में कथा दुलकी चाल से दौड़ने लगती है। अलका की तलाश पूरी होती है पाठक इस मैराथन खेले में शुरू से लेकर आखिर तक सांस रोके रहता है उसे लगता रहता है ये नदी के दो कूल एक दूजे को देख तो सकते हैं मिल नहीं पाएंगे। 
 
उपन्यास  में यूं दर्ज़न भर से ज्यादा पात्र हैं जो ऑक्सिलरी मेडिसिन की तरह उद्दीपन और उद्दीपक की तरह कथा को आगे ठेल ने में मदद गार बनते हैं कहीं कोई स्पीड ब्रेकर नहीं है उद्दाम आवेग है रागात्मक आलोड़न है यहां ,उपन्यास पढ़ने से ताल्लुक रखता है सिर्फ एक मर्तबा नहीं बार -बार।        

Shipping FREE 

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

विद्या विनय सम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनी | शुनि चैव श्वपाके च पंडिता : समदर्शिन :||

 विद्या विनय सम्पन्ने  ब्राह्मणे गवि हस्तिनी |  शुनि चैव  श्वपाके च पंडिता :  समदर्शिन :||  ज्ञानी महापुरुष विद्याविनययुक्त ब्राह्मण में और चांडाल तथा गाय , हाथी एवं कुत्ते में भी समरूप परमात्मा को देखने वाले होते हैं।  व्याख्या : बेसमझ लोगों द्वारा यह श्लोक प्राय :  सम व्यवहार के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। परन्तु श्लोक में 'समवर्तिन  :' न कहकर 'समदर्शिन  :' कहा गया है जिसका अर्थ है -समदृष्टि न कि सम -व्यवहार। यदि स्थूल दृष्टि से भी देखें तो ब्राह्मण ,हाथी ,गाय और कुत्ते के प्रति समव्यवहार असंभव है। इनमें विषमता अनिवार्य है। जैसे पूजन तो विद्या -विनय युक्त ब्राह्मण का ही हो सकता है ,न कि चाण्डाल का ; दूध गाय का ही पीया जाता है न कि कुतिया का ,सवारी हाथी पर ही की  जा सकती है न कि कुत्ते पर।  जैसे शरीर के प्रत्येक अंग के व्यव्हार में विषमता अनिवार्य है ,पर सुख दुःख में समता होती है,अर्थात शरीर के किसी भी अंग का सुख  हमारा सुख होता है और दुःख हमारा दुःख। हमें किसी भी अंग की पीड़ा सह्य नहीं होती। ऐसे...

तोको पीव मिलैंगे घूँघट के पट खोल रे

यहां भी पधारें : Videos 2:41 Ghoonghat Ke Pat Khol Re Tohe - Jogan 1950 - Geeta Dutt YouTube  ·  Suhanee Lall 2 minutes, 41 seconds 14-Jul-2012 (१ ) Videos 28:34 कबीर : घूँघट के पट खोल YouTube  ·  CEC 28 minutes, 34 seconds 24-Aug-2020 (१ )https://www.youtube.com/watch?v=ar5lHsWN3Fg तुमको  प्रीतम  मिलेंगे,  अपने  घूँघट  के  पट  खोल  दे।  हर  शरीर  में  वही  एक  मालिक  आबाद  है।  किसी  के  लिए  कड़वा  बोल  क्यों  बोलता  है।  धन  और  यौवन  पर  अभिमान  मत  कर  क्योंकि  यह  पाँच  रंग  का  चोला  झूठा  है।  शून्य  के  महल  में  चिराग़  जला  और  उम्मीद  का  दामन  हाथ  से  मत  छोड़।  अपने  योग  के  जतन  से  तुझे  रंगमहल  में  अनमोल  प्रीतम  मिलेगा।  कबीर...

लेकिन आदमी की आँख भी गज़ब कर देती है। पति की तो और भी ज्यादा देख लेती है। यही है पैरानोइया पैरानॉयड बिहेवियर सोशल शिज़ोफ्रेनिया।

कृपया यहां भी पधारें : (१) Lajwanti - Wikipedia (२) Lajwanti (1958) - Lajwanti (1958) - User Reviews - IMDb इस जमाने को प्रेम अच्छा लगता है  ना प्रेमी। स्त्री -पुरुष संबंधों की अपनी ही भाव छवि बनाये बैठा है ज़माना।इसी  बनी  बनाई मन गढंत  छवि का शिकार बनती हैं " लाजवंती  "की नायिका कविता (अदाकारा नरगिश ). पति एक नामीगिरामी एडवोकेट हैं वकालत में पूरी तरह गुम। पत्नी टुकुर टुकुर उनकी बाट जोहा करती है। विशेष और आम दिनों में भी कोई निश्चय नहीं रहता उनके आने का।  इसी दरमियान यूरोप से उनके मित्र लौटते हैं एक बेहद ज़िंदादिल इंसान सच्चे सीधे दोस्त हैं सुनील ज़माना उनके और कविता के किरदार का अफ़साना बना देता है। बस उनका कुसूर इतना है वह अपनी भाभी साहिबा का पोर्ट्रेटिएट(एक व्यक्ति चित्र )बनाकर अपने दोस्त निर्मल की आने वाली विवाह की सालगिरह पर  सौंपना चाहता है ताकि उसे निर्मल के  वैयक्तिक चित्र के साथ सज्जित किया जा सके। इसी आशय को मूर्त रूप देने के लिए सुनील के घर कविता के सब्जिक्ट के बतौर बैठकें होने  लगती हैं। कविता की अपनी भाभी ही  शक़ के बीज को उर्वर...