सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

रहिमन वे नर मर चुके जो कहीं माँगन जाएँ , उन ते पहले वे मुए जिन मुख निकसत नाएँ (व्याख्या सहित)

रहिमन वे नर मर चुके ,जे कहुँ माँगन जाहिं ,

उनते पाहिले वे मुए ,जिन मुख निकसत नाहिं। 

भावसार :भीख मांगना मरने से बदतर है। जो व्यक्ति भिक्षाटन करके भरण पोषण करता है वह मरे हुए जैसा ही है लेकिन जो व्यक्ति कहता है कुछ नहीं है भिक्षा होते हुए भी देने से इंकार कर देता है वह मांगने वाले से भी बदतर है। यहां भरणपोषण के लिए श्रम  की महत्ता की ओर  संकेत है।जगत में मांगने से मान घटता है पुरुषार्थ करने से मान में वृद्धि होती है। 

सन्देश :व्यक्ति पुरुषार्थ करके खाये आदमी। हराम का नहीं। 


माँगत माँगत मानि घटै ,प्रीति घटै नित के घर जाई ,

औछे के संग में बुद्धि घटै ,क्रोध घटै मन के समुझाई।

तेज़ घटै पर नारि के संग में ,बुद्धि घटै बहुभोजन खाई। 

दयाल कहै सुनि रे मन मूरख ,पाप घटै हरि के गुन  गाई। 

 भावार्थ  -जगत में किसी के आगे हाथ फैलाने से मान घटता है ,रोज़ -रोज़ किसी के घर जाने से प्रेम घटता है ,छिछोरे हलकी सोच और निगाह वाले अदूरदर्शी निकृष्ट व्यक्ति के संग से मेधा का ह्रास होता है ,परनारी के संग आदमी का बलवीर्य  उसकी साख तेज़ और ओज़ समाप्त होने लगता है। लेकिन जो हरिका नाम स्मरण करता है उसके तमाम क्लेशों पापकर्मों का नाश हो जाता है। 

पर नारी पैनी छुरी, विरला बांचै कोय।

 कबहुं छेड़ि न देखिये, हंसि हंसि खावे रोय।।


पर नारी का राचना, ज्यूं लहसून की खान। 
कोने बैठे खाइये, परगट होय निदान।।


पर नारी पैनी छुरी कबहु न करिये संग ;

रावण के दस सिर गए ,पर नारि के संग. 


 



 

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

विद्या विनय सम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनी | शुनि चैव श्वपाके च पंडिता : समदर्शिन :||

 विद्या विनय सम्पन्ने  ब्राह्मणे गवि हस्तिनी |  शुनि चैव  श्वपाके च पंडिता :  समदर्शिन :||  ज्ञानी महापुरुष विद्याविनययुक्त ब्राह्मण में और चांडाल तथा गाय , हाथी एवं कुत्ते में भी समरूप परमात्मा को देखने वाले होते हैं।  व्याख्या : बेसमझ लोगों द्वारा यह श्लोक प्राय :  सम व्यवहार के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। परन्तु श्लोक में 'समवर्तिन  :' न कहकर 'समदर्शिन  :' कहा गया है जिसका अर्थ है -समदृष्टि न कि सम -व्यवहार। यदि स्थूल दृष्टि से भी देखें तो ब्राह्मण ,हाथी ,गाय और कुत्ते के प्रति समव्यवहार असंभव है। इनमें विषमता अनिवार्य है। जैसे पूजन तो विद्या -विनय युक्त ब्राह्मण का ही हो सकता है ,न कि चाण्डाल का ; दूध गाय का ही पीया जाता है न कि कुतिया का ,सवारी हाथी पर ही की  जा सकती है न कि कुत्ते पर।  जैसे शरीर के प्रत्येक अंग के व्यव्हार में विषमता अनिवार्य है ,पर सुख दुःख में समता होती है,अर्थात शरीर के किसी भी अंग का सुख  हमारा सुख होता है और दुःख हमारा दुःख। हमें किसी भी अंग की पीड़ा सह्य नहीं होती। ऐसे...

तोको पीव मिलैंगे घूँघट के पट खोल रे

यहां भी पधारें : Videos 2:41 Ghoonghat Ke Pat Khol Re Tohe - Jogan 1950 - Geeta Dutt YouTube  ·  Suhanee Lall 2 minutes, 41 seconds 14-Jul-2012 (१ ) Videos 28:34 कबीर : घूँघट के पट खोल YouTube  ·  CEC 28 minutes, 34 seconds 24-Aug-2020 (१ )https://www.youtube.com/watch?v=ar5lHsWN3Fg तुमको  प्रीतम  मिलेंगे,  अपने  घूँघट  के  पट  खोल  दे।  हर  शरीर  में  वही  एक  मालिक  आबाद  है।  किसी  के  लिए  कड़वा  बोल  क्यों  बोलता  है।  धन  और  यौवन  पर  अभिमान  मत  कर  क्योंकि  यह  पाँच  रंग  का  चोला  झूठा  है।  शून्य  के  महल  में  चिराग़  जला  और  उम्मीद  का  दामन  हाथ  से  मत  छोड़।  अपने  योग  के  जतन  से  तुझे  रंगमहल  में  अनमोल  प्रीतम  मिलेगा।  कबीर...

लेकिन आदमी की आँख भी गज़ब कर देती है। पति की तो और भी ज्यादा देख लेती है। यही है पैरानोइया पैरानॉयड बिहेवियर सोशल शिज़ोफ्रेनिया।

कृपया यहां भी पधारें : (१) Lajwanti - Wikipedia (२) Lajwanti (1958) - Lajwanti (1958) - User Reviews - IMDb इस जमाने को प्रेम अच्छा लगता है  ना प्रेमी। स्त्री -पुरुष संबंधों की अपनी ही भाव छवि बनाये बैठा है ज़माना।इसी  बनी  बनाई मन गढंत  छवि का शिकार बनती हैं " लाजवंती  "की नायिका कविता (अदाकारा नरगिश ). पति एक नामीगिरामी एडवोकेट हैं वकालत में पूरी तरह गुम। पत्नी टुकुर टुकुर उनकी बाट जोहा करती है। विशेष और आम दिनों में भी कोई निश्चय नहीं रहता उनके आने का।  इसी दरमियान यूरोप से उनके मित्र लौटते हैं एक बेहद ज़िंदादिल इंसान सच्चे सीधे दोस्त हैं सुनील ज़माना उनके और कविता के किरदार का अफ़साना बना देता है। बस उनका कुसूर इतना है वह अपनी भाभी साहिबा का पोर्ट्रेटिएट(एक व्यक्ति चित्र )बनाकर अपने दोस्त निर्मल की आने वाली विवाह की सालगिरह पर  सौंपना चाहता है ताकि उसे निर्मल के  वैयक्तिक चित्र के साथ सज्जित किया जा सके। इसी आशय को मूर्त रूप देने के लिए सुनील के घर कविता के सब्जिक्ट के बतौर बैठकें होने  लगती हैं। कविता की अपनी भाभी ही  शक़ के बीज को उर्वर...